मिट्टी के मनुष्य की तलाश कब खत्म हुई है। गहरी निंद्रा में भी भटक रहा है। ताम्बूल चबाते सोच गटक रहा है। सड़क निहार डगमगा रहा है। स्वप्नों में भी शगुन-अपशगुन का दंश झेल रहा है। जो रोग न हुआ ज़ाहिर उसे खुली आँखों से मौन हो सोच रहा है। बेवजह मुस्कुरा ख़मोशी ओढ़ रहा है!! फुट-फुट कर रोने की वजहें बहुत है, ग़मों के गुलिस्तां में। घायल मन उमड़ता है, बरसता नहीं। इक अजब दर्द है अब कागज़ पर उतरता नहीं। आइना बहुत साफ किया पर अपना अक्स दिखता नहीं। लाख कोशिशें की मुस्कुराने की पर अब होंठो पर मुस्कान सजती नहीं!! दुखी पाठशाला में सब नैनों में आये सैलाब में बह रहे है। नोका में हुए छेद से गंगा में डूब रहे है। आंखे मूंदकर देवताओं से बचा लेने की गुहार कर रहे है। व्याकुल मन को अंगीठी में जला स्वर्ण कर रहे है!!
तुम आकाश, मैं पृथ्वी तुम आकाश में उड़ते स्वछन्द परिन्दे, और मैं पृथ्वी पर कांटों के बीच खिलती एक नर्म नाज़ुक कली, तुम आकाश में किरणें बन न जाने कहा-कहा पहुँच जाते हो, पृथ्वी को भी अपने आग़ोश में भर लेते हो, तुम रात को अलविदा कह रोज़ कैसे भोर की चांदनी ले आते हो, तुम्हारी अरुणाई में पत्ता पत्ता/बूटा बूटा खिल उठता है। मेरे आंगन की तुलसी भी तुम्हारी अरुणाई से हरी/भरी हो मुस्कुरा उठती है। तुम मेरे चौके में भी घुस जाते हो चुपके से रोशनदान के जरिये, जब सुबह मैं चाय बनाती हूँ। ऐसा लगता है। तुम मेरी चाय में इलायची की खुसबू से समा गये हो। और जब मैं अख़बार उठाती हूँ, पढ़ने के लिए तुम वहाँ भी कभी समाचार से कभी शायरी से मेरी नज़रो को छेड़ते रहते हो। तुम कभी मेरी धुप, कभी मेरी छाया बनते रहते हो। मुझमें पूरी पृथ्वी का रहस्य समाया हुआ है। पर तुम्हारी रौशनी के बिना ये अधूरा, इसलिए तुम इसमें भी बीज बन समा जाते हो। इसे अपनी अरुणाई से पूरा कर देते हो। मेरी कविताओं में तुम...... मेरी उपमाओं में तुम...... मेरी लेखनी के कलम की निब में भी तुम..... तभी तो निखरता है.....मेरी कव...
क्या सही क्या गलत, आजकल कुछ समझ नहीं आता, विष का प्याला धीरे-धीरे गटक रही हूँ। सबपे यक़ी कर खुद का यक़ी खो रही हूँ। कुछ चित्र सहेजे है, दर्पण में अक्स देख रही हूँ। अशांत जगह में, खुद को शांत रख रही हूँ। गुस्से को पी, सबको खुश रखने की कोशिश कर रही हूँ। खुद में उलझती जा रही हूँ, पर रिश्तें सुलझाने की कोशिश कर रही हूँ। बेचैन दिल को, वर्तमान का हवाला दे, समय से बांध रही हूँ। मिट्टी के शरीर को, इत्र से महका, जीवन जी रही हूँ!!
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