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दिसंबर, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

पीर मन की...!!!

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दिसम्बर की धुप गले लगाने का मन करता है। अंगीठी के सामने कुल्हड़ की चाय पीने का मन करता है। सर्द हवाओं को कम्बल के बाहर खदेड़ने का मन करता है। गुड़ की मीठी रोटी माँ के हाथों से खाने का मन करता है। छत की सुनहरी धुप अपनी कलम में भरने का मन करता है। टुकड़े-टुकड़े हुई यादों को सहेजकर अपने सीने में भरने का मन करता है। तेरे ज़ख्मो पर अपने गीले मोतियों से मरहम लगाने का मन करता है। तेरे संग जिद्द की धुप में हँसी-ठिठोली करने का मन करता है। तेरी परछाई में अपनी परछाई मिलाने का मन करता है। तुझे कसकर गले लगा सारे गीले-शिकवे मिटाने का मन करता है। अपनी हथेली से बदनसीबी की लकीर मिटाने का मन करता है। गुजरते साल को अलविदा कहने से पहले कसकर गले लगाने का मन करता है! तेरी यादों को तरोताज़ा कर.. दिल में संजो कर रख लिया है। सुनहरी धुप से कुछ वादे कर.. बिखरी जिन्दगी को.. नये साल में समेटकर.. खुद में रखने का वादा खुद से कर लिया है!!

जीवन जी रही हूँ.....!!

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क्या सही क्या गलत, आजकल कुछ समझ नहीं आता, विष का प्याला धीरे-धीरे गटक रही हूँ। सबपे यक़ी कर खुद का यक़ी खो रही हूँ। कुछ चित्र सहेजे है, दर्पण में अक्स देख रही हूँ। अशांत जगह में, खुद को शांत रख रही हूँ। गुस्से को पी, सबको खुश रखने की कोशिश कर रही हूँ। खुद में उलझती जा रही हूँ, पर रिश्तें सुलझाने की कोशिश कर रही हूँ। बेचैन दिल को, वर्तमान का हवाला दे, समय से बांध रही हूँ। मिट्टी के शरीर को, इत्र से महका, जीवन जी रही हूँ!!

यादों का कड़वा घूंट

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मन की तलाशी क्या ली हर रंग ख़फ़ा हो गया पुराना किस्सा पहाड़ो से गिर गले लग खूब रोया। आसमां से टुटा बादलों का टुकड़ा धरती के गले लग खूब रोया। धीमी आंच पर पकती यादें आँखों से गुजर जाऱ-जाऱ रोई। मन के जाले में फंस खूबसूरत स्मृतियां भी कटी पतंग सी हो गई। बीत चुकी किस्सों की मिट्टी कट-कट घायल कर गई। गठरी भर यादें जिस्म नमकीन, दिल खाली कर गई। लिबास यादों का कुंठा मन की कनखियों से सलाम कर गई। जिन्दगी की अफरा-तफरी में यादों का कड़वा घूंट पिला कर चली गई!!

नर्म सर्दियाँ...

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मौसम बदला पहाड़ी नमी घर आई। अंगीठी की आंच मन को भाई। ठंडे तापमान ने साजिश रच सबको धुप में खड़ा किया। धरती ने धुंध की चादर ओढ़ सबको गर्मशॉल में दबोचा जंगली सर्दी घर के सारे खिड़की दरवाजे बंद कर रजाई में दुबक कर कांप रही है। नर्म सर्दियां मुँह में स्वाद घोल मक्के बाजरे की मोटी रोटी संग गुड़, साग का स्वाद चख गर्म राबड़ी पी मौज मना रही है!!

समुद्र सोख रीति हुई है.....!!

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धरा में सिमट आसमां में उड़ने की ख्वाइश जीवन डगर में आई अड़चने बिचौलिए सी भूमिका निभाते समझौते कितना कुछ बदल गया देखते/देखते मेहँदी में छुपी भाग्य रेखा ढूंढती रह गयी। हाथ जोड़ मिन्नते करती रह गयी। ताले सभी तोड़े पर बंद कपाट न खुले दरवाज़े की ओट में छिपकर उम्मीदें बुनती रह गयी। धूल ज़मी तकदीर पर अश्क़ो की बुँदे गिराती रह गयी। बंधनों में तिलमिलाती रह गयी। रिश्तों का खोखलापन जिन्दगी का उजला सवेरा खा गया। अरमान सारे धूल में मिला गया। मौन जिन्दगी शोर ज़्यादा हो गया है। दायरे में घुटन आक्रोश में भय प्रकट हो गया है। तिलिस्म सा जीवन वक्त की दीवारों में कैद हो गया है!!

जीवन खंड-खंड हुआ है....!!

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गम्भीता ओढ़ मन खंड-खंड हुआ है। ताजा हँसी भूल यादों का गुलाम हुआ है। समझौतावादी मनुष्य जीवन रुग्ण हुआ है। बेतुकापन.. आत्म-प्रताड़ना का कारण हुआ है। आध्यात्मिकता भूल जीवन शूल हुआ है। दुर्भावना में.. विचारों का अतिक्रमण हुआ है। जीवन के रहस्य स्वयं के आर-पार नृत्य कर रहे। छिन-भिन.. जीवन अस्तित्व हुआ है। अनिर्वाय जीवन जिन्दगी में.. उदासी का गुलाम हँसी का मोहताज़ हुआ है!