तुम आकाश, मैं पृथ्वी तुम आकाश में उड़ते स्वछन्द परिन्दे, और मैं पृथ्वी पर कांटों के बीच खिलती एक नर्म नाज़ुक कली, तुम आकाश में किरणें बन न जाने कहा-कहा पहुँच जाते हो, पृथ्वी को भी अपने आग़ोश में भर लेते हो, तुम रात को अलविदा कह रोज़ कैसे भोर की चांदनी ले आते हो, तुम्हारी अरुणाई में पत्ता पत्ता/बूटा बूटा खिल उठता है। मेरे आंगन की तुलसी भी तुम्हारी अरुणाई से हरी/भरी हो मुस्कुरा उठती है। तुम मेरे चौके में भी घुस जाते हो चुपके से रोशनदान के जरिये, जब सुबह मैं चाय बनाती हूँ। ऐसा लगता है। तुम मेरी चाय में इलायची की खुसबू से समा गये हो। और जब मैं अख़बार उठाती हूँ, पढ़ने के लिए तुम वहाँ भी कभी समाचार से कभी शायरी से मेरी नज़रो को छेड़ते रहते हो। तुम कभी मेरी धुप, कभी मेरी छाया बनते रहते हो। मुझमें पूरी पृथ्वी का रहस्य समाया हुआ है। पर तुम्हारी रौशनी के बिना ये अधूरा, इसलिए तुम इसमें भी बीज बन समा जाते हो। इसे अपनी अरुणाई से पूरा कर देते हो। मेरी कविताओं में तुम...... मेरी उपमाओं में तुम...... मेरी लेखनी के कलम की निब में भी तुम..... तभी तो निखरता है.....मेरी कव...
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