हमारा जीवन मूल्य , हमारी विचारधारा तय करती है......
और हमारे विचारों की उड़ान हमेशा सकारात्मक होनी चाहिए........
असफलता
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असफलता इंसान को तोड़ती ही नहीं, अंदर से खोखला भी कर देती है। फिर उसमें भरता है क्रोध, वो क्रोध जो उसका सर्वस्व निगलने की ताकत रखता है। और वो क्रोध उस इंसान को एक दिन निगल ही जाता है।
मिट्टी के मनुष्य की तलाश कब खत्म हुई है। गहरी निंद्रा में भी भटक रहा है। ताम्बूल चबाते सोच गटक रहा है। सड़क निहार डगमगा रहा है। स्वप्नों में भी शगुन-अपशगुन का दंश झेल रहा है। जो रोग न हुआ ज़ाहिर उसे खुली आँखों से मौन हो सोच रहा है। बेवजह मुस्कुरा ख़मोशी ओढ़ रहा है!! फुट-फुट कर रोने की वजहें बहुत है, ग़मों के गुलिस्तां में। घायल मन उमड़ता है, बरसता नहीं। इक अजब दर्द है अब कागज़ पर उतरता नहीं। आइना बहुत साफ किया पर अपना अक्स दिखता नहीं। लाख कोशिशें की मुस्कुराने की पर अब होंठो पर मुस्कान सजती नहीं!! दुखी पाठशाला में सब नैनों में आये सैलाब में बह रहे है। नोका में हुए छेद से गंगा में डूब रहे है। आंखे मूंदकर देवताओं से बचा लेने की गुहार कर रहे है। व्याकुल मन को अंगीठी में जला स्वर्ण कर रहे है!!
क्या सही क्या गलत, आजकल कुछ समझ नहीं आता, विष का प्याला धीरे-धीरे गटक रही हूँ। सबपे यक़ी कर खुद का यक़ी खो रही हूँ। कुछ चित्र सहेजे है, दर्पण में अक्स देख रही हूँ। अशांत जगह में, खुद को शांत रख रही हूँ। गुस्से को पी, सबको खुश रखने की कोशिश कर रही हूँ। खुद में उलझती जा रही हूँ, पर रिश्तें सुलझाने की कोशिश कर रही हूँ। बेचैन दिल को, वर्तमान का हवाला दे, समय से बांध रही हूँ। मिट्टी के शरीर को, इत्र से महका, जीवन जी रही हूँ!!
पीड़ा कैसी भी हो, आँखों के कोरो पर नमी आ ही जाती है। दिल का दर्द जबां से निकल ही जाता है। गहरा अनुभव श्वेत हो ही जाता है। अपनी ही बर्बादी का जश्न कैसा? चित्कार स्वभाविक है। अशांत वातावरण में, अनिश्चितता आयेगी ही। मदिरालय की मदिरा से जिस्म बहकता है, अंगारे में जल राख होता है। तेजाब में जल स्वाहा होता है। बेरंग झील में यक़ी का खून हुआ हो तो, शहर भर में काले-बादलों का शोर गूंजेगा ही। आत्मीयतता ले डूबी, अब बाढ़ में मिट्टी कटेगी ही। संवेदना का जहर पियो तो, सच्चाई जाऱ-जाऱ रोयेगी ही। पत्थर पर सर पटक-पटक मर जाओ, आस्था चुप कराने भी न आयेगी। पथरीले, बोझील, नाउम्मीदी सफ़र में, ख्यालों में भी मंजिल के दर्शन कहा हो पाते है। बंजर ज़मी में लहू सींच दो, वृक्षों का जमघट कहाँ लग पता है। पीड़ा कैसी भी हो, आँखों के रास्ते बाहर फैल ही जाती है। दर्द का मंजर समेटे, काले बादलों में मिल, बाढ़ ले ही आती है। ले ही आती है!!!
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